Thursday, 2 April 2015

तेरे एहसास ...जय विजय अप्रैल 2015 में प्रकाशित




दिल से उठते हैं ये बुलबुले
एहसासों का सैलाब लिये
उड़ना चाहते हैं ये
खुले आसमान पर
मगर दिल के बंद दरवाज़ों से टकरा
चटक जाते हैं
और हम लग जाते हैं
उन्हें समेटने
कहीं मैले न हो जायें
या कोई झांक न ले इनमें
जानते हो ना
दीवारों के भी कान होते हैं
मगर कुछ बच पाते हैं
और कुछ बिख़र जाते हैं
और हम खो जाते हैं
झोली में बचे एहसासों में
और बह जाते हैं
भावनाओं के दरिया में
दो किनारों की धारा जैसे
एक किनारा कुछ मिठास लिये
दूसरा दर्द का एहसास लिये
अनजाने लग जाते हैं किसी एक किनारे
फिर शुरू होता है....
एक बवंडर तेज गर्म हवाओं का
या पुरवाई सी ठंडी घटायों का
और हम जी लेते हैं वोह लम्हा
क्यों कि जी चुके हैं हम हरदिन
ये अनगिनित बार
तेरे एहसास.........
                                    ........मोहन सेठी 'इंतज़ार'