Tuesday, 31 March 2015

हवा थम गई ........


ज़ुल्फ़ हवा में जो लहराई तेरी
तो ये हवा ही थम गई
पत्तिओं ने झिलमिलाना रोक
पूछा हवा से कि मामला क्या है ?
रुक गई कैसे ?
डालियाँ जो झुकीं थीं
क्यूँ झुकीं ही रह गयीं 
हवा ने कहा....कि थम यूँ गई   
इन ज़ुल्फ़ों की बदली में
एक चाँद नज़र आया है ....
जिसने ये कहर मुझपे ढाया है !
अब तू ही बता मैं भी क्या कहूँ...
तुम ज़ुल्फ़ें ना खुली यूँ छोड़ा करो
इस अदा से
सारी कायनात का ना दिल यूँ तोड़ा करो !!
                                        ........मोहन सेठी 'इंतज़ार'