Wednesday, 11 February 2015

कुछ दूर कुछ पास ........



इतना तो पास रह कि तेरी खुशबु रहे फिज़ाओं में
और तेरा अक्स दिखता रहे मुझे दिल की घटाओं में

जा इतनी दूर कि मैं रहूँ पास होने के बहकावे में
और तुझे गलतफहमी रहे बहुत दूर हो जाने में

इस तरहें जी लेंगे दोनों भरम अपने अपने में
जिन्दगी यूँ ही बसर कर लेगे सपने सपने में

चलो बैठ कर नये समझोते की तहरीर लिख लेते हैं
थोड़ा दूर थोड़ा पास रहने की रिवायत शुरू कर लेते हैं

अपने अपने उजाड़ में आब-ए-चश्म से गुल खिला लेते हैं
आबरू अपनी बचा आशियाना अपना अपना बसा लेते हैं

चलो कुछ दूर कुछ पास रह लेते हैं .........

                                          ........मोहन सेठी 'इंतज़ार'