Monday, 4 May 2015

तड़प .....


सागर में मछली
स्वछंद घूमती है
हाँ बड़ी छोटी को खाती है 
मगर इंसान
पहले धोखे से मुहँ में कांटा फ़साता है
फिर खींच झटके से और अड़ाता है
पानी से निकाल
ना खाता है
ना डुबाता है
बस तड़पने को डब्बे में छोड़ जाता है
कुछ पल देखती रही ईस अजूबे को
ऐसे ज़ालिम समंदर में तो ना थे
क्या था पता उसे
समंदर के बाहर की दुनिया का
ये इंसान हैं  .....
बस तड़पते हैं और तड़पाते हैं !!
                                    ........मोहन सेठी 'इंतज़ार'