Saturday, 9 May 2015

अपेक्षाएँ ........


अपेक्षा थी मुझे इंसान से
कि इतनी प्रगति के बाद
हर एक को जीने का हक़ मिलेगा
मगर उल्टा हो रहा है
हर कोई दूसरे को लूट के
अपना घर भरे जा रहा है
दूसरे की रोटी छीन कर
जरूरत से जाएदा खाए जा रहा है
आदमी को देखो आज भी
औरत को नीचा दिखाये जा रहा है
बंदरों को केले खिलाये जा रहा है
और भगवान के बन्दों को
धूल चटाये जा रहा है
अपेक्षा किस से क्या करोगे
हर कोई तो यहाँ
उपेक्षा का राग गुनगुनाये जा रहा है !!
                                       .........मोहन सेठी 'इंतज़ार'