Saturday, 30 May 2015

फ़साद ........


काश ये दिल ही ना होता
फिर ये एहसासों का फ़साद ना होता
यूँ हर कोई दुनियाँ में
इतना बर्बाद ना होता !

ना ये टूटे हुए दिल होते
ना मैं लाचार होता
बस एक तीरंदाज़ होता
भूख तो भूख होती
इस भूख का भी
भोजन सा अंदाज़ होता !

ये मेरे बस में कहाँ
कि ये सब बदल डालूं
अगर कर सकता
तो क्या मैं ख़ुदा ना होता
और अगर मैं ख़ुदा होता
तो इतना लाचार क्यूँ होता
तू मेरी राधा और मैं तेरा मोहन ना होता !!

                       ........मोहन सेठी 'इंतज़ार'