Monday, 16 March 2015

आम लोग ........

एक धारा के प्रवाह में सब बह रहे हैं
कौन हिम्मत करे रुख मोड़ने का
कौन साहस करे पर्वत तोड़ने का !
तिमिर भी सहनीय है जब सबको           (तिमिर=अँधेरा)
तिमिरारि बनने की चाह फिर किसको !   (तिमिरारि=सूर्य )
खिल-खिला रहे हैं सब ऊपर ऊपर
दर्द से टूटे जा रहे हैं सब भीतर भीतर !
कौन ललकारे इन रावणों को !
राम की राह तकते तकते !
सब सो रहे हैं जगते जगते !
ध्यान से देखो ...सब रो रहे हैं
इस धारा के प्रवाह में बहते बहते !!
                                     ........मोहन सेठी 'इंतज़ार'