Wednesday, 11 March 2015

दर्द ........

जिंदगी बसर कर लेते हैं
कभी आकाश तो कभी पाताल
का सफ़र कर लेते हैं
हर दिन यूँहीं
नहीं निकल जाता
कभी जिंदा दिली का
तो कभी जिंदा मुर्दों का
अभिनय कर लेते हैं
कभी अपने
तो कभी दूसरों के दर्द
दर्द करते हैं... !

मोती हम तो
आंख में रोक देते हैं
वर्ना ये तो दिल का
दरिया सोख लेते हैं !
सीख रहा हूँ
पहाड़ के नीचे
लोग कैसे जिंदगी तमाम
बसर कर लेते हैं
सड़क पे जन्मे
सड़क पे पले
सड़क पे जिन्दगी
तमाम कर लेते हैं
पिछले जन्म का फल बता
धर्म और समाज इन्हें शांत कर देते हैं
हर अन्याय को भाग्य बता
अपने पाप माफ़ कर लेते हैं !
मगर जब कुछ ना सूझे
तो प्रभु की ईच्छा
कह कर टाल देते हैं !!
                                ........मोहन सेठी 'इंतज़ार'