Tuesday, 11 November 2014

चिडिया की कहानी .....



1.
पेड की ऊँची ऊँची 
मजबूत बाँहों में 
तिनका तिनका कर
माँ ने बसाया था घर
दिन रात बैठी अंडे गर्माती
बिन दाना पानी समाधी लगाती
जीवन का लक्ष्य यही था उसका
अंडे देना फिर चूजे बनाना
दाना खिला उनको उड़ना सिखाना
हैवानो की दुनिया में खुद को बचाना

2.
पंखो की झलक मुझे
नज़र आने लगी थी
सोचा जल्दी मुझे लग जाएँगे पर
ये सोच मेरा मन पुलकित हुआ 
फिर एक शाम ऐसा अचम्भा हुआ
लौटी नहीं माँ अँधेरा हुआ
बिलखती भूख से मैं रोने लगी
न जाने भयावह रात कैसे कटी
मगर माँ मेरी फिर कभी ना लौटी
अफवाह सुनी थी उड़ती उड़ती
मेरी माँ बिल्ली के हथे चढ़ी
बड़ा पडफडाई और गिडगिडाई 
सुना है वो मेरे लिये बड़ा थी रोई
सुबह तक डरी सहमी भूखी प्यासी
न पर थे मेरे के उड़ कहीं जाऊँ
गिरी अगर पेड से तो
गिर के मर ना जाऊँ
या बिल्ली होगी नीचे ताक लगाये
करती भी क्या कुछ समझ न आये 
बेबसी की थी ये मेरी कहानी
बिलख बिलख के मैंने
आवाज कई माँ को लगाई

3.
इतनी देर में 
एक चील थी आयी
मुझे देख वो जरा मुस्कराई
सोचा चलो किसी को तो तरस आयी
अब शायद मैं तो बच जाऊँ
फरिस्ता जो रब ने था भेजा
चोंच जो उसने मेरी तरफ बढ़ायी
सोचा मेरे लिये है शायद दाना लायी
चोंच तो उसकी थी एकदम खाली
झपट कर उसने मुझे चोंच में उठाली
मत पूछ कितनी पीड़ा थी जगी 
डर से मैंने अपनी आंखें थी मूंधी
जो हुआ था माँ को अब मेरी बारी आयी
माँ की तरहें एक वहशी के हाथों मेरी मौत आयी

कुछ दरिन्दे देखे थे उसने
इन्सान कहाँ अभी देखे थे उसने 
                                    ...........इंतज़ार