Saturday, 1 November 2014

मेरी दुआ


क्यों कहते हो अब दिल लगाने को
छोड़ आया हूँ कब से मैं हर बहाने को

हर शाम तेरी गली में घूमता हूँ
तेरी यादों के बबंडर से मिलके आने को

न गुल हैं.. न तू है.. न महक तेरी
गुलशन में आऊँ तो क्या होगी वजह मेरी

तेरी यादों के समन्दर में डूब जाता हूँ
अब तो सांसें भी लेना भूल जाता हूँ

एक बार तो बुलाया होता मुझ को
कभी ऐसे भी आज़माया होता मुझ को

मुमकिन है तुम रोयी होगी बिछुड़ के मुझ से
मैं तो रोने और हँसने में फ़र्क भूल जाता हूँ

मैंने तो सिर्फ़ तुझे अपना दिल दिखाया था
बता मैंने कब तेरा दिल दुखाया था

हर गम मैंने अपने ही दिल में छिपाया था
तुझको मैंने कब कोई शिकवा सुनाया था

जुदा न करना उसकी यादों के जख्म मेरे दिल से
मैं हर बार रब से ये ही दुआ क्यों मांग आता हूँ

                                             ......इंतज़ार