Friday, 5 June 2015

बेहिसाब बरसो........


मेरे जीवन में तुम आ के बरसो
आसमानी बादल बन के ना बरसो
पास आ सैलाब बन के बरसो
पुरवाई का झोंका बन के ना बरसो
प्यार की अंगार बन के बरसो
मिलन की आस बन के बरसो
बोसों की बौछार बनके बरसो
चांदनी बन के ना बरसो
चकोरी की प्यास बन के बरसो
उमंगों के आकाश से
एहसासों की बारात बन के बरसो
तनहाइयाँ बहुत हुईं
एक मिलन की रात बन के बरसो
अब जैसे भी बरसो .... 
मगर कुछ ऐसे बरसो
कि बेहिसाब हो के बरसो !!

                                       .......मोहन सेठी 'इंतज़ार'