Sunday, 9 August 2015
Saturday, 8 August 2015
रखा क्या है ........
पीते रहे हम दरबदर सोचा ज़माने में रखा क्या है
तेरी आँखों से पी तो सोचा मैखाने में रखा क्या है !!
मुस्कुराते रहे दर्द-ओ-अलम पर हम उम्र तमाम
कांधे पे तेरे रोये तो सोचा मुस्कुराने में रखा क्या है !!
ग़ज़ल कहने को कलम भावनाओं में यूँ बह निकली
जब डूब ही गए तो सोचा बहर मिलाने में रखा क्या है !!
तुझ पर शायरी लिखने की सोचते रहे एक मुद्द्त से
सोचा काली सिहाई तेरे दिल पे लगाने में रखा क्या है !!
तेरे एहसासों की बारिश में भीगे हम कुछ इस तरहां
सोचा अब सावन की बारिश में नहाने में रखा क्या है !!
इस दुनियाँ की भीड़ में यूँ तो हरकोई शख्स तनहा है
तुझे तनहा देख सोचा महफ़िल सजाने में रखा क्या है !!
करना है अगर इश्क़ तो फिर आग में कूद कर देख
'इंतज़ार' ज़रा सोच दूर से दिल जलाने में रखा क्या है !!
........मोहन सेठी 'इंतज़ार'
Friday, 7 August 2015
माँ ........
गंगा तो पवित्र है
इन्सानों के दुष्कर्म
अनवरत बहाना इसका चरित्र है
मैली पड़ जाती है
फिर भी बहती जाती है
आखिर माँ है
चुप चाप सहती जाती है
मगर दूषित करने वाले
माँ पुकार कर भी
ज़हर पिलाते जाते हैं
दुखों का अम्बार जुटाते जाते हैं
कहाँ किसी को ये प्यार दे पाते हैं
स्वार्थ ही तो कर्म है इनका
बस यही धर्म निभाते जाते हैं
इक दिन ये राख़ बन जाएंगे
माँ से मिलने फिर वापस आएंगे
किस मुहं से मुक्ति मांग पाएंगे
मगर गंगा तो आखिर गंगा माँ है
मना भी तो ना कर पायेगी
माँ क्या होती है
जो जीते जी ना समझ सके
अब राख़ बन क्या ख़ाक समझ पाएंगे !!
........मोहन सेठी 'इंतज़ार'
Thursday, 6 August 2015
Tuesday, 4 August 2015
Sunday, 2 August 2015
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