Tuesday, 9 December 2014

इर्षा .....


वोही समुद्र तट
जहाँ हम दोनों मिल
हर शाम लहरों का लड़क्पन
देखते हैं
सूरज की ढलती दीप्तिमान तपिश
मस्त पुरवाई का झोंका
और उसमें मीठी बौछार

समुद्र के सीने से लहरों का उभरना
एक दुसरे से ऊँची छलांग लगा
मानो पीछा कर रही हों
और आख़िर आपस में घुल जाना
खो जाना कहीं  रेत के विस्तार में
या चट्टान से टकरा
कूदना आसमान पे
मानो हमारे मिलन का
उत्सव मना रही हों ये लहरें

हम भी तो इसी उत्सव में जीते हैं
हर शाम यहीं पर
सीने से जो उमंगें
पुलकित हो उठती हैं
एक दुसरे की उमंगो का मेल
उल्हास और क्रीड़ा
फिर घुल के एक होना
कैसा अनुपम अनुभव है
एक दूजे को पा लेना

ये सपना था कैसा
जिस में तू थी लेकिन मैं ना था
इतनी दर्द उठी सीने में
जब देखा
तेरी परछाई... जो थी मेरी
किसी और को बाँहों में समेटे
उसी जगह बैठी थी
समुद्र तट पर
जहाँ हम रोज बैठते थे
मिलते थे घुलते थे

आँसू न रुके
इर्षा लगी इतनी
और विश्वास न हुआ
क्या कमी थी मेरे प्यार में
फिर ये बेरुखी कैसी
क्यों... क्यों....
मत जा छोड़ मुझे
न जी पाउँगा
मेरा हर माईना निकलता है
सिर्फ़ तुझ से
तुझ से शुरू हो
तुम पर ही समाप्त होता हूँ

बताओ क्यों किया ऐसे .....

रोते रोते जब आँसू खुश्क हुए
सोचा देखूँ कोन है
जिसने मुझ से छीना है तुझे
मगर सपना ही टूट गया

हो सकता है
मेरी ही परछाई थी वोह
बिलकुल मैं ही हूँगा
तु बेवफ़ा थोड़ा ना है .....
                                           .........

                           
            

Monday, 8 December 2014

नहाना ....


शावर में जब गया नहाने......

लगा पानी की धारा
जैसे गंगा सा
बहता प्यार हमारा
गर्म नर्म पानी
ने मुझ को यूँ लपेटा
आगोश में हो तूने
जैसे मुझे समेटा

भाप उठती रही
गर्म पानी से ऐसे
तेरी मंडराती रूह आयी हो
जैसे जोड़ने अपने नाते

तेज पानी सर पे रहा
ऐसे थप थपाता
सोये एहसासों को
जैसे हो जगाता

पानी फ़र्श से टकराता
रहा ऐसी धुन लगाता
मेरी उमंगो के गीत
जैसे वोह हो गाता

पानी की ये बूंदें
सब मिलके धीरे धीरे
तेरी भावनाओं से मेरे
दिल को हो जैसे सिलाता

शीशे पे धुंद जमी थी
उंगली से यूँ लिखा था
"मुझे भूलना नहीं तुम
मेरा प्यार जगा के रखना"
क्या तुमने ये लिखा था

गीला बदन ये मेरा
तेरी प्यास से सुकाया
फिर मैंने इत्र जब लगाया
तेरी याद में जा खोया
तुझे याद कर के रोया

न आया कर तू हरदम
हर वक़्त इस तरह से
दर्द मेरा तू नहीं जानती
और तेरी ख़ामोशी
मुझ से बातें करने से नहीं मानती
                                                  ......इंतज़ार

Sunday, 7 December 2014

कतरा .....


कतरा वो मेरे प्यार का
आंख से
कलम पे जा गिरा
स्याही फैल गई
जब नाम मैंने तेरा लिखा
चाहतें बन प्यार की
कमबख्त तुझ में जा मिला
चूमा जो तेरा नाम
तो मुझे तुझ में मैं मिला

तब से हुआ यकीन
कि हम तुम एक जान हैं ....
                          ........इंतज़ार 

Saturday, 6 December 2014

तो मैं कुछ लिखूं ......


तू मुझे प्यार से अपने दिल में सजोये
तो मैं कुछ लिखूं
प्यार की बू तुझ से आये
तो मैं कुछ लिखूं
प्यार की चिंगार जल जाये
तो मैं कुछ लिखूं
तू एक उम्मीद मेरे दिल में जगाये
तो मैं कुछ लिखूं
तू मेरी धडकनों की रफ़्तार बढ़ाये
तो मैं कुछ लिखूं
तू मुझ में तलब जगाये
तो मैं कुछ लिखूं
तू मेरी उमंगों को आकाश पर उड़ाये
तो मैं कुछ लिखूं
नहीं तो दिल ही तोड़ दे ज़ालिम
टूटे दिल की ही सही... कुछ तो लिखूं
सब जल के ख़ाक हो जाये
तो फिर मैं लिखूं ....
                       .......इंतज़ार

Friday, 5 December 2014

एहसासों की प्यास ....

एक कल्पना है सच्चा प्यार
बस झूठा सपना है यार

दुनिया का रंग
जब उसमें छू जाता है
प्यार बेचारा बेरंग हो जाता है

रिश्तों की बू
जब इस में आने लगती है
इसकी रंगत मुरझाने लगती है

जिस्मानी रिश्तों की अगर तृष्णा होती है
तो स्वार्थ की गुंजाईश इसमें दबी होती है
इसिलिये एहसासों की प्यास दूषित होती है
बेचारी कुंठित रोती है सच्ची प्यास कहाँ होती है
                                                               .....इंतज़ार

Thursday, 4 December 2014

जीत ....


एक पतंग हूँ
किसी ने मुझे उकसाया 
और आसमान पर उड़ाया
उड़ता रहा खुले आसमान पर 
फिर एक पतंग मिली 
जो मेरी तरहां ऊँची उड़ान पर थी  
शायद ढूंडती होगी अपने प्यार को 
चाहत होगी मेरी तरहां उसे भी 
कोई उसके जैसा मिले 
जिसके साथ वोह अपनी उड़ान
मदहोशियों में उड़ सके 
अरमानों की लहर लिये
खुली हवाओं की तरंग में  

कुछ पास आये 
तो ख्वाईशों के तूफ़ान ने 
हवा के झोंके से मजबूर किया 
और हम एक दुसरे के आलिंगन में आ घिरे  
मेरी डोर उसकी डोर में आ लिपटी  
जो एहसास हमने फिर जिये 
चाहतों के जाम पिये  
कोई क्या जाने 

चाहा कुछ पल यूँ हीं जी लें 
मगर डोर किसी और के हाथ थी 
और उनको जल्दी थी हमें काटने की 
अपनी जीत की 
हमें लूटने की 
वोह क्या जानें
कि कटने की पीड़ा क्या होती है 
अपने प्यार से बिछुड़ने की
टीस क्या होती है 

हर कोशिश की जुदा न होने की 
मगर क्या करते
किसीने ऐसी खींच लगाई डोर में 
दोनों कट कर आलिंगन से जुदा हो गये 
फिर न जाने उसको किसने लूटा 
और मैं बेसहारा उड़ते 
गिरते पड़ते 
झाड़ियों में जा अड़ा
टूट गए मेरे अस्थी पंजर 
क्यों सोचें वह मेरा 
वोह तो अपनी जीत की ख़ुशी में 
फूले नहीं समा रहे होंगे
वोह जीत जो दूसरों को काट कर
उनके अरमानों को मसल कर
जीती जाये क्या सच में जीत है 
                     ....इंतज़ार

चाँद का सूरज ....


मैं चाँद हूँ
और तू मेरा सूर्य 
हमारा प्यार
चिरकाल से है
मेरी आंख हमेशा 
तुम पर ही लगी रहती है 
तुम सदेव
अपनी किरणों से
अपने प्यार के एहसासों
की बौछार कर
मुझे तृप्त रखते हो

तभी तो चांदनी है मेरी 

हाँ मैं तुम्हें निहारता रहता हूँ
मगर विवश हूँ
गले नहीं लग सकता
तुम पास आते हो और 
फिर दूर हो जाते हो इतना 
कि दुनियाँ के एक तरफ़ तुम 
और दूसरी तरफ मैं

हम दूरीयाँ बनाये
रखने पर मजबूर हैं
तेरा मेरा मिलना
असम्भव है
अगर हम मिल गए
तो इस दुनियाँ का ही
अंत हो जायेगा

प्यार की मजबूरियाँ 
भी अजीब हैं 
चाँद और सूरज भी असहाय हैं 
कितने मजबूर हैं 
मिल न पायेंगे
मगर कोई भी
इसे झुठला नहीं सकता 
ये प्यार सत्य है
ये प्यार अंनत है

सुनो ..... 
सूर्य और चाँद की तरहें
            ना जाने कितने और अफ़साने होंगे .......
                                                    .........इंतज़ार